1. विकास के विभिन्न स्वरों का वर्णन करें एवं उसकी विशेषताओं का शैक्षणिक प्रावधान में इसके मुख्य संदर्भ बताएं।
उत्तर-
विकास के संबंध में कहा जा सकता है कि मानव में होने वाले प्रमुख
परिवर्तनों होने वाली प्रकृति ही विकास है बालक या व्यक्ति परिपक्वता और
अधिगम के आधार पर पूर्व में अधिक्रमित गुणों तथा योग्यताओं को प्रदर्शित
करता है तथा अपने भीतर सुनो और योग्यताओं का विकास करता है।
विकास
के फोटो के लिए बहुत से मनोवैज्ञानिकों ने अपना सिद्धांत दिया है बालक में
संज्ञानात्मक विकास एवं क्रियात्मक विकास के लिए जीन पियाजे में
संख्यात्मक विकास के लिए सिद्धांत दिया है के अनुसार बच्चों में नैतिक
विकास दो प्रकार के होते यह दो प्रकार आयु के आधार पर वर्गीकृत किया है।
जीन
पियाजे स्विट्ज़रलैंड के एक मनोवैज्ञानिक थे, नैतिक विकास का वैज्ञानिक
अध्ययन1928 से प्रारंभ किया। 1932 मैं उनकी मशहूर पुस्तक the moral
judgment of the child का प्रकाशन हुआ। यादें का मत था कि बच्चों में
नैतिक निर्णय के विकास में एक निश्चित क्रम एवं तार्किक पैटर्न होता है। यह
सरकार कार्मिक परिवर्तन जो बच्चों के बौद्धिक विकास से संबंधित होते हैं,
पर आधारित होते हैं।
प्यार
देने बच्चों को अपने नैतिक विकास में एक सक्रिय सहभागिता आया है वह इस
सिलसिले में वातावरण के साथ बच्चों में होने वाले गतिशील अंतर्क्रिया पर
अधिक बल देते थे। उनका मत था कि जैसे जैसे बच्चे अपने वातावरण के साथ
सहयोग करते हैं परिवर्तित करते हैं। जब वह वातावरण में तो उनके
व्यवहार में पढ़ने का परिमाण स्वरुप परिवर्तन हो जाए। कब होगी मारना है और अधिगम सिद्धांत के नैतिक विकास में बच्चों को सर्वेयर पर्यावरण प्रापक माना गया है।
पियाजे के नैतिक विकास के सिद्धांत हमें तो अवस्थाएं होती है
1. प्रायत नैतिकता की अवस्था(stage of Heteronomous Morality)- इस अवस्था को नैतिक वास्तविकता की अवस्था भी कहां जाता है
नैतिक विकास की पहली अवस्था होती है जिससे होकर प्रायः सभी बच्चे गुजरते हैं
यह अवस्था लगभग 2 वर्ष से 8 वर्ष की आयु होती है। पियाजे ने यह स्पष्ट किया है कि इस अवस्था बच्चों एवं वयस्कों के समय अंतर्क्रिया से होती है। इस अवस्था में प्राप्त स्कूली अवस्था तथा आरंभिक स्कूली साल दोनों ही सम्मिलित होते हैं इस अवस्था में बच्चे सत्तावादी वातावरण में डूबे होते हैं जिनमें उनका स्थान निश्चित रूप से बड़ों से नीचे होता है। इस अवस्था में बच्चों में नैतिक काजोल मोदी स्पीच ऑफ परिवर्तनशील होता है। शायद यही कारण है कि इस अवस्था को नैतिक वास्तविकता की अवस्था या दबाव की नैतिकता की अवस्था कहा जाता है। किस अवस्था में बच्चे यह समझते हैं कि कोई भी नियम बाहर प्रति अधिकारी जैसे माता-पिता की ओर से आते हैं उसे हर हालत में अपने शिकार करना है यह व्यवहारवाद होते हैं तथा वे समय के साथ परिवर्तनशील नहीं है अर्थात वह आज भी रहेंगे और कल भी रहेंगे। दूसरे शब्दों में कहा जा सकता है कि इस अवस्था में पूर्णरूपेण नैतिक विश्वास बना रहता है। बच्चे यह भी समझते हैं कि यह नियमों के किसी भी तरह के विचलन से उन्हें सख्त से सख्त दंड दिया जाएगा।
2. सवायत नैतिकता की अवस्था( stage of autonomous morality)- यह अवस्था बड़े बच्चों में 9 वर्ष से 11 वर्ष की आयु तक प्राप्त होती। जहां पर आयात व नैतिकता बच्चों तथा वयस्कों के बीच संबंध से उत्पन्न होती है वहीं ऑटोनॉमस नैतिकता बच्चों के समान स्तर के लोगों 18 जाति संबंधी के बीच के संबंधों से उठती है। इस ढंग का संबंध जब समाज में बौद्धिक वर्धन वयस्कों के दबाव में कमी के साथ संयोजित हो जाता है, तो इस से बच्चों में एक विशेष तरह की नैतिकता विकसित होती है जिनमें अन्य बातों के अलावा तर्कसंगत, लचीलापन तथा सामाजिक चेतना की विशेषताएं होती है। अपने साथी संबंधियों बच्चों में न्याय का ऐसा ज्ञान विकसित होता है, जिसमें दूसरों के अधिकारों के लिए चिंता, तथा मानव नैतिकता को एक संबंधों में समानता तथा परिपत्र आधी दिखाई जाती है। सचमुच में यादें ऑटोनॉमस नैतिकता को एक प्रजातांत्रिक कथा समतावादी मानते हैं जो पारस्परिक आदर आधारित की होती है। इस अवस्था में बच्चा अब यह समझने लगता है कि सामाजिक नियम एक मनमाना अनुबंधन होता है इसके बारे में प्रश्न उठाया जा सकता है तथा इस में परिवर्तन संभव है।
अथॉरिटी के प्रति कल आना आवश्यक है और ना ही ईसा वांछनीय।
दूसरों बच्चों के भाव एवं विचारधाराओं व्यवहार का मूल्यांकन करने में उन पर ध्यान देता है
वह स्पष्ट कहते हैं कि जब भी किसी को दंडित किया जाए, तो गलत करने वाले व्यक्ति का इरादा को भी ध्यान में रखा जाना तथा उनके द्वारा किए गए अतिक्रमण को भी ध्यान में रखना चाहिए
पियाजे के नैतिक विकास के सिद्धांत हमें तो अवस्थाएं होती है
1. प्रायत नैतिकता की अवस्था(stage of Heteronomous Morality)- इस अवस्था को नैतिक वास्तविकता की अवस्था भी कहां जाता है
नैतिक विकास की पहली अवस्था होती है जिससे होकर प्रायः सभी बच्चे गुजरते हैं
यह अवस्था लगभग 2 वर्ष से 8 वर्ष की आयु होती है। पियाजे ने यह स्पष्ट किया है कि इस अवस्था बच्चों एवं वयस्कों के समय अंतर्क्रिया से होती है। इस अवस्था में प्राप्त स्कूली अवस्था तथा आरंभिक स्कूली साल दोनों ही सम्मिलित होते हैं इस अवस्था में बच्चे सत्तावादी वातावरण में डूबे होते हैं जिनमें उनका स्थान निश्चित रूप से बड़ों से नीचे होता है। इस अवस्था में बच्चों में नैतिक काजोल मोदी स्पीच ऑफ परिवर्तनशील होता है। शायद यही कारण है कि इस अवस्था को नैतिक वास्तविकता की अवस्था या दबाव की नैतिकता की अवस्था कहा जाता है। किस अवस्था में बच्चे यह समझते हैं कि कोई भी नियम बाहर प्रति अधिकारी जैसे माता-पिता की ओर से आते हैं उसे हर हालत में अपने शिकार करना है यह व्यवहारवाद होते हैं तथा वे समय के साथ परिवर्तनशील नहीं है अर्थात वह आज भी रहेंगे और कल भी रहेंगे। दूसरे शब्दों में कहा जा सकता है कि इस अवस्था में पूर्णरूपेण नैतिक विश्वास बना रहता है। बच्चे यह भी समझते हैं कि यह नियमों के किसी भी तरह के विचलन से उन्हें सख्त से सख्त दंड दिया जाएगा।
2. सवायत नैतिकता की अवस्था( stage of autonomous morality)- यह अवस्था बड़े बच्चों में 9 वर्ष से 11 वर्ष की आयु तक प्राप्त होती। जहां पर आयात व नैतिकता बच्चों तथा वयस्कों के बीच संबंध से उत्पन्न होती है वहीं ऑटोनॉमस नैतिकता बच्चों के समान स्तर के लोगों 18 जाति संबंधी के बीच के संबंधों से उठती है। इस ढंग का संबंध जब समाज में बौद्धिक वर्धन वयस्कों के दबाव में कमी के साथ संयोजित हो जाता है, तो इस से बच्चों में एक विशेष तरह की नैतिकता विकसित होती है जिनमें अन्य बातों के अलावा तर्कसंगत, लचीलापन तथा सामाजिक चेतना की विशेषताएं होती है। अपने साथी संबंधियों बच्चों में न्याय का ऐसा ज्ञान विकसित होता है, जिसमें दूसरों के अधिकारों के लिए चिंता, तथा मानव नैतिकता को एक संबंधों में समानता तथा परिपत्र आधी दिखाई जाती है। सचमुच में यादें ऑटोनॉमस नैतिकता को एक प्रजातांत्रिक कथा समतावादी मानते हैं जो पारस्परिक आदर आधारित की होती है। इस अवस्था में बच्चा अब यह समझने लगता है कि सामाजिक नियम एक मनमाना अनुबंधन होता है इसके बारे में प्रश्न उठाया जा सकता है तथा इस में परिवर्तन संभव है।
अथॉरिटी के प्रति कल आना आवश्यक है और ना ही ईसा वांछनीय।
दूसरों बच्चों के भाव एवं विचारधाराओं व्यवहार का मूल्यांकन करने में उन पर ध्यान देता है
वह स्पष्ट कहते हैं कि जब भी किसी को दंडित किया जाए, तो गलत करने वाले व्यक्ति का इरादा को भी ध्यान में रखा जाना तथा उनके द्वारा किए गए अतिक्रमण को भी ध्यान में रखना चाहिए
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